राजा किसी काम से अपने मोहल्ले के गली से गुजर रहा था। कि उन्हें देखकर गांव की बूढ़ी माई बोलने लगी.... कहां रहिथस,अब्बड़ दिन में दिखें हस,आज कल ए गली में दिखच नहीं!इस पर राजा ने चेहरे पर हल्की मुस्कान लिए हुए ...अपने खेती-किसानी में व्यस्तता की जानकारी देते हुए.... आगे बढ़ गया। कुछ जरूरी काम से वह निकला था।जिसके कारण वह रूका नहीं और आगे बढ़ गया। पर बूढ़ी माई के प्रश्नों पर सोचने जरूर लगा ....कि अपने ही इस मोहल्ले में यकीनन काफी दिनों बाद इधर से गुज़रा है!
कुछ देर बाद राजा का फिर उसी गली से वापसी हुआ। राजा ने इस बार ध्यान दिया कि बूढ़ी माई अभी भी वहीं पर बैठी धूप सेंक रही हैं। ज्यों ही पास पहुंचा तो राजा के कान में बूढ़ी माई के कुछ आवाजें सुनाई दी!पर स्पष्ट नहीं था।वैसी भी बूढ़ी माई लगभग 80बरस की हो गई थी। तो कमजोरी उसके शरीर और शब्दों में देखी जा सकती थी।बूढ़ी माई की आवाज़ तो कम थी ही-साथ में राजा भी अपने धून में रमा हुआ चले आ रहा था। जिसके कारण से वह बूढ़ी माई की बात को समझ नहीं सका। पर इस बार राजा ने रूककर जानने का प्रयास जरूर किया कि बूढ़ी माई कह क्या रही हैं।
"कम्बल दे हौ,ते ह बने गरमथे केहे हव बेटा।उही ल अभी ठण्डा में ओढ़ के सोथव"
...बूढ़ी माई के इस शब्द ने कान से प्रवेश करते हुए मानों राजा के पुरे अंतर्मन को अमृत की बारिशों से भिगों दिया था। साथ ही साथ उनके वात्सल्य रस में निहाल राजा अपने काम-धाम,दुख-दर्द सब कुछ भूल गया। अपने नयन से बहने को आतुर आंसुओं को संभालते हुए प्रफुल्लित मन से उसके कुशलक्षेम पूछकर राजा वापस घर लौट आए।
घर लौटने पर राजा के पत्नी ने देखा , कि उसके पति के चेहरे में एक अलग ही खुशी के चमक है।जो घर से निकलते समय के मनोभावों से बिल्कुल ही अलग थे।मानो लाखों की लाटरी लगी हो या कोई कीमती गहने मिल गया हो!
पति के सुख-दुख की संगिनी पत्नी बिना देर किए जिज्ञासु प्रश्नों की बौछार के साथ- चेहरे पर चमक का कारण जानना चाही।कि कुछ खास बात तो है! क्या बात है!!
संदर्भ सहित व्याख्या करते अब राजा के चेहरा मानो खुशी से और लाल हो रहा था... लाखों की लाटरी नहीं-पर लाखों कमा कर भी हासिल नहीं कर सकने वाला इनाम था... कीमती गहना तो नहीं पर मानव के शरीर का इससे अच्छा कोई गहना भी नहीं था - इतना प्यारा... इतना बहुमूल्य!!!
बात आज से तीन -चार साल पहले की थी...जब गांव में गुरू घासीदास जयंती समारोह आयोजित किया गया था।जिसमें समाज के कुछ प्रबुद्धजनों के विचार से यह तय किया गया...कि इस वर्ष रात्रि कालीन मनोरंजक कार्यक्रम के बदले, क्यों न उन बुजुर्गों को कम्बल भेंटकर सम्मानित किया जाएं। जिनके गोदी में पल-बढ़ कर हम बड़े हुए हैं...मान-सम्मान के अधिकारी बन सकें है। इसके तहत प्रत्येक परिवार से साठ साल आयु पूरी कर चुके लगभग 25-30 बुजुर्गों की सूची तैयार कर कार्यक्रम में सम्मान सहित आमंत्रित कर सम्मानित किया गया था.... इस सोच के साथ कि हम व्यवस्था बदलने कि बात तो करते हैं।पर जब तक हम अपने विचारों पर काम करके सही व्यवस्था नहीं बना लेते... तो सोचना मात्र थोथी बातें ही रह जाती हैं।जिसका कोई मोल नहीं।
हमारा उद्देश्य था कि जब हम किसी व्यक्ति के मृत्यु पर अन्य लोगों के द्वारा कपड़ा ओढ़ाने की व्यवस्था का विरोध करते हैं। तो क्यों न हम उस व्यक्ति को जीवित रहते ही - सम्मान दे - समस्या में साथ दे! आजीवन ठण्ड(कठीन समय) में सहकार दें!!बनिस्बत अंत समय में जलने -जलाने का माध्यम बनें।
कुछ बुजुर्ग कुछ दिनों -वर्षो तक उस कम्बल को उपयोग कर सतलोक गमन कर गए।तो कुछ बुजुर्ग आज भी और आजीवन उस कम्बल का उपयोग कर उसके लागत-तथागत की उद्देशिका को शत् प्रतिशत पूरी करेंगे। *इससे बड़ा सम्मान - इससे बड़ी खुशी का सत्कार* कुछ और हो भी नहीं सकता। जिस बहुमूल्य रत्न को धारण कर आपके चेहरे की चमक प्रकाशमान न हो।
इस गांव समाज के प्रबुद्धजनों की बौद्धिक क्षमता और उसे कार्यरूप देने पर प्रशंसा के हकदार हैं....कि इस गांव के समाज ने.... एक वर्ष गुरू घासीदास जयंती समारोह पश्चात बचे हुए पैसों से गांव के शासकीय स्कूल को कम्प्यूटर- प्रोजेक्टर्स भेंट किए थे.....इस सोच के साथ, कि जिस विद्यालय में तीन -चार पीढ़ी पढ़कर निकल कर उनसे प्राप्त ज्ञान से हमारा जीवन प्रकाशित है।कि अपने परिवार -समाज के साथ ही साथ उस विद्यालय के प्रति भी हमारी नैतिक जिम्मेदारी बनती हैं-कि गुरू दक्षिणा स्वरूप कुछ योगदान दे। और विद्यालय एवं स्थानीय प्रशासन उसका सदुपयोग कर गांव के बच्चों को उत्कृष्ट शिक्षा लाभ देवें।
..…तथा अगले वर्ष के जयंती समारोह में उसी मनोरंजक कार्यक्रम के बदले- बचे हुए पैसों से गांव -समाज के बच्चों को लगभग 300 जोड़ी स्कूली मोजे-जूते प्रदाय किए गए थे। जिसमें सर्व समाज के बच्चों को शामिल करके *बाबा गुरू घासीदास जी के मानव-मानव एक समान* के विचारों को आत्मसात किया गया था। और इस नेक सोच के साथ कि विद्यालय जाने वाले हमारे बच्चों के पैर में कांटे नहीं गढ़ने चाहिए -पढ़ेगा बच्चा-तभी बढ़ेगा बच्चा।
प्रणाम हैं ऐसे महान विचारों वाले - गुरू और उन्हें आत्मसात करने वाले समाज -प्रबुद्धजनों को
आशा ही नहीं पूरा विश्वास है -कि गुरू के संदेश को आत्मसात कर व्यवस्था परिवर्तन का कारवां निरंतर जारी रहेगा....कि यही सच्ची गुरू सेवा और गुरू घासीदास जयंती होगा।


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